Hindi kavita

बहुत कुछ पाना अभी बाक़ी है,
हक़दार होजाना अभी बाक़ी है।

ज़िन्दगी जो सियाह रात थी अब तक,
इमरोज़ फ़क़त चिराग़ बुझे हैं,
सहर होजाना अभी बाक़ी है।

वो लोग जो क़सूरवार थे अब तक,
इमरोज़ फ़क़त बेक़सूर हुए हैं,
आज़ादी पाना अभी बाक़ी है।

सोये थे जो गहरी नींद में अब तक,
इमरोज़ फ़क़त चश्म खुली हैं,
बेदार होना अभी बाक़ी है।

सूखे जो शज़र खड़े थे अब तक,
इमरोज़ फ़क़त गुंचे खिले हैं,
बहार आना अभी बाकी है।

थे कफ़स में जो लोग अब तक,
इमरोज़ फ़क़त परवाज़ हुए हैं,
उड़ानें भरना अभी बाक़ी है।

बेजुबां करदिए गए थे अब तक,
इमरोज़ फ़क़त ज़ुबाँ मिली है,
आवाज़ उठाना अभी बाक़ी है।

सुनी न गई थी जो बात अब तक,
इमरोज़ फ़क़त वो बात सुनी है,
उसपे अमल करना अभी बाक़ी है।

मुतलक़ अभी न यह जंग हुई ‘ऋshabh’,
लंबी लड़ाई लड़ना अभी बाक़ी है।
बहुत कुछ पाना अभी बाक़ी है,
हक़दार होजाना अभी बाक़ी है।
ऋshabh

इमरोज़- today.
बेदार- wide awake.
गुंचे- buds.
कफ़स- caged.
परवाज़- the one who fly.
मुतलक़- complete.

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